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आरक्षण के मुद्दे पर चिराग-मांझी आमने-सामने, उपेंद्र कुशवाहा ने दी संयम की नसीहत

 
आरक्षण के मुद्दे पर चिराग-मांझी आमने-सामने, उपेंद्र कुशवाहा ने दी संयम की नसीहत

Bihar Political News: बिहार की सियासत में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। आरक्षण को लेकर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बीच सामने आए मतभेदों के बीच अब राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने दोनों नेताओं को संयम बरतने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक और वैचारिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन सार्वजनिक बयानबाजी में मर्यादा बनाए रखना जरूरी है।

आरक्षण को लेकर हाल के दिनों में एनडीए के घटक दलों के नेताओं की ओर से अलग-अलग बयान सामने आए हैं। इसी को लेकर बिहार की राजनीति में चर्चा तेज हो गई है। चिराग पासवान ने आरक्षण को संविधान से मिला अधिकार बताते हुए इसकी व्यवस्था को कमजोर किए जाने का विरोध किया था। वहीं, जीतन राम मांझी की ओर से आरक्षण के भीतर पिछड़ी जातियों को अलग हिस्सेदारी देने की बात कही गई।

मतभेद हो सकते हैं, लेकिन भाषा संयमित हो

इस पूरे विवाद पर उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि अलग-अलग मुद्दों पर नेताओं के विचार अलग हो सकते हैं। किसी विषय पर असहमति होना असामान्य नहीं है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में एक-दूसरे के खिलाफ बयान देते समय शब्दों की मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए।

उन्होंने संकेत दिया कि गठबंधन की राजनीति में आपसी संवाद और संयम बेहद महत्वपूर्ण है। राजनीतिक मतभेदों को व्यक्तिगत विवाद का रूप देने से बचना चाहिए।

आरक्षण पर अपने-अपने तर्क

दरअसल, आरक्षण के मुद्दे पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की राय अलग-अलग नजर आ रही है। चिराग पासवान का कहना है कि आरक्षण संविधान द्वारा दिया गया अधिकार है और इसे खत्म या कमजोर करने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर, जीतन राम मांझी लंबे समय से आरक्षण का लाभ समाज के सबसे वंचित वर्गों तक पहुंचाने के लिए इसके भीतर वर्गीकरण की वकालत करते रहे हैं। उनका तर्क है कि आरक्षण का लाभ सभी वंचित समूहों तक समान रूप से पहुंचे और जो समुदाय अब तक इसका पर्याप्त लाभ नहीं उठा सके हैं, उन्हें भी हिस्सेदारी मिले।

एनडीए के भीतर बयानबाजी ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल

चिराग पासवान और मांझी के बयानों के बाद एनडीए के भीतर आरक्षण को लेकर चर्चा तेज हो गई है। दोनों नेताओं के समर्थक भी अपने-अपने पक्ष को मजबूती से रख रहे हैं। ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा की संयम बरतने की अपील को गठबंधन के भीतर बढ़ती बयानबाजी को शांत रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

बिहार में विधानसभा चुनावी राजनीति के बीच आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर नेताओं के बयान का राजनीतिक असर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि गठबंधन के नेता इस मुद्दे पर अपने मतभेदों को किस तरह सामने रखते हैं और क्या आपसी संवाद के जरिए विवाद को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है।