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बिहार विधानसभा की एक-एक ईंटे गारवशाली इतिहास का साक्षी है..7 फरवरी 1921 और 7 फरवरी 2026 का वो परिसर केवल स्थापना दिवस समारोह नहीं बल्कि एक पूरी सदी से अधिक लोकतांत्रिक सफर का प्रतीक है

Proud History Of Bihar Vidhan Sabha: इसी दिन 1921 में बिहार और ओडिशा प्रांतीय परिषद की पहली बैठक हुई थी. गंगा किनारे बसे पटना में उस वक्त अंग्रेजी शासन का असर साफ दिखता था, लेकिन उसी भवन से आगे चलकर भारतीय लोकतंत्र की मजबूत आवाज निकली.
 
BIHAR VIDHANSABHA

Proud History Of Bihar Vidhan Sabha: तारीख थी 7 फरवरी 1921… गंगा के किनारे बसे पटना की हवा में एक नया उत्साह था. शहर की सड़कों पर धूल उड़ाती घोड़ा-गाड़ियां और सजी-धजी बग्घियां एक नए बने शानदार भवन की ओर बढ़ रही थीं. यह भवन था-बिहार और ओडिशा प्रांतीय परिषद का नया घर. इसी दिन 1921 में बिहार और ओडिशा प्रांतीय परिषद की पहली बैठक हुई थी. गंगा किनारे बसे पटना में उस वक्त अंग्रेजी शासन का असर साफ दिखता था, लेकिन उसी भवन से आगे चलकर भारतीय लोकतंत्र की मजबूत आवाज निकली. आज जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला आज (7 फरवरी 2026) को उसी परिसर में कदम रखें तो वह केवल एक 105वां स्थापना दिवस समारोह नहीं है, बल्कि एक पूरी सदी से अधिक लोकतांत्रिक सफर का प्रतीक रहेगा.

इतालवी शैली और अंग्रेजों का शाही अंदाज

आज जिसे हम बिहार विधानसभा कहते हैं, वह वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है. इस भवन को ‘इतालवी पुनर्जागरण शैली’ (Italian Renaissance Style) में बनाया गया था. उस दौर के मशहूर आर्किटेक्ट ए.एम. मिलवुड ने इसे डिजाइन किया था. 1920 में जब यह बनकर तैयार हुआ तो इसकी भव्यता ने सबको हैरान कर दिया था. अर्धवृत्ताकार मेहराब और ऊंचे गोलाकार खंभे आज भी इसकी पहचान हैं. पहली बैठक में जब गवर्नर लॉर्ड सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा ने संबोधन दिया था, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यहां से उठने वाली आवाजें एक दिन देश-राज्य की तकदीर तय करेंगी.

शुरुआती दौर में सदन के भीतर का माहौल आज से बिल्कुल जुदा था. सदस्य सूट-बूट और हैट लगाकर आते थे, लेकिन धीरे-धीरे गांधीवादी लहर ने सदन की तस्वीर बदल दी. पुरानी यादों के अनुसार, आजादी की लड़ाई के साथ-साथ सदन के भीतर भी ‘स्वदेशी’ ने जगह बनाई और धोती-कुर्ता सत्ता का नया ड्रेस कोड बन गया. उस दौर में विधानसभा सदस्य बग्घियों से भी आतते थे.  श्री बाबू (श्रीकृष्ण सिंह) और अनुग्रह बाबू जैसे दिग्गजों के भाषणों की गूंज आज भी इन दीवारों में कहीं न कहीं सुरक्षित महसूस होती है.

7 फरवरी की तारीख बिहार विधानसभा के इतिहास में बहुत खास है. दरअसल , 1912 में बिहार और ओडिशा को बंगाल से अलग करने के बाद से ही एक स्वतंत्र विधायी परिषद की जरूरत महसूस की जा रही थी. 1920 में वर्तमान विधानसभा भवन का निर्माण पूरा हुआ और 7 फरवरी 1921 को नवनिर्मित भवन में बिहार-ओडिशा प्रांतीय परिषद की पहली बैठक हुई. इस पहली बैठक की अध्यक्षता सर वाल्टर मोडे ने की थी और तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा ने इसे संबोधित किया था. तभी से हर साल 7 फरवरी को बिहार विधानसभा का स्थापना दिवस मनाया जाता है.

इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि 1952 के पहले चुनाव के बाद सदन में सदस्यों की संख्या 331 थी. झारखंड अलग होने के बाद अब यह 243 है. दृष्टि आईएएस की रिपोर्ट बताती है कि भले ही नक्शा बदल गया, लेकिन बिहार विधानसभा की गरिमा वैसी ही है. 2026 का यह स्थापना दिवस इसलिए भी खास है, क्योंकि यह बजट सत्र के साथ जुड़ा है. सदन के अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार की मौजूदगी में जब ओम बिरला और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश एक साथ मंच साझा करेंगे तो यह भारत की संघीय व्यवस्था (Federal Structure) की मजबूती को दिखाएगा.

कागजों से ‘क्लिक’ तक का सफर

1921 में सदन की कार्यवाही भारी-भरकम रजिस्टरों और स्याही वाली कलमों से चलती थी. आज 105 साल बाद यही विधानसभा पूरी तरह से हाईटेक हो चुकी है. 2026 के इस उत्सव की सबसे बड़ी प्रासंगिकता ‘डिजिटल लोकतंत्र’ है. ‘नेवा’ (National e-Vidhan Application) सेवा केंद्र का उद्घाटन यह बताता है कि बिहार की विधायी परंपरा पुरानी जरूर है, लेकिन उसकी सोच पूरी तरह आधुनिक है. अब विधायक कागज के बंडलों के बजाय टैबलेट पर बजट पढ़ते हैं.

इस बार के उत्सव से ठीक पहले एक छोटा सा हादसा भी हुआ. विधानसभा के बाहरी हिस्से का एक छोटा सा छज्जा गिर गया. ऐसे में यह इस बात का संकेत है कि इस 105 साल पुरानी विरासत को अब और भी अधिक जतन और संरक्षण की जरूरत है. हालांकि, प्रशासन ने फौरन इसकी मरम्मत कराई है ताकि जब 7 फरवरी को स्थापना के उत्सव की शहनाई गूंजे तो सब कुछ चमकता हुआ नजर आए. यह स्थापना दिवस महज एक सरकारी आयोजन नहीं है. यह उस यात्रा का एक और पड़ाव है जो 1921 की पहली ‘बग्घी’ से शुरू होकर 2026 के ‘डिजिटल टैबलेट’ तक पहुंची है. 7 फरवरी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक निरंतरता का उत्सव है जो 1921 से 2026 तक बिना रुके चलती रही है.