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राज्यसभा की पांच सीटें, बिहार में सियासी संग्राम: क्या निशांत की एंट्री तय? तेजस्वी पर भी निगाहें

 
राज्यसभा की पांच सीटें, बिहार में सियासी संग्राम: क्या निशांत की एंट्री तय? तेजस्वी पर भी निगाहें
Bihar news: बिहार में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। पांच सीटों पर होने वाले चुनाव से पहले ही सत्ता और विपक्ष  दोनों खेमों में रणनीति बैठकों का दौर तेज हो गया है। सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की संभावित एंट्री को लेकर है।

फैसला नीतीश का, नजरें जदयू पर

जदयू के वरिष्ठ नेता विजय कुमार चौधरी ने साफ कहा है कि राज्यसभा किसे भेजा जाएगा, यह निर्णय पूरी तरह नीतीश कुमार लेंगे। उन्होंने भरोसा जताया कि एनडीए पांचों सीटों पर जीत दर्ज करेगा और इनमें से दो सीटें जदयू के हिस्से में जानी चाहिए।
निशांत कुमार के राजनीति में आने को लेकर उन्होंने संकेत दिए कि यदि वे कदम रखते हैं तो पार्टी के सभी नेता उनका स्वागत करेंगे। जदयू के भीतर भी एक वर्ग उनकी सक्रिय भूमिका चाहता है। हालांकि अब तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

बढ़ती सक्रियता ने बढ़ाया कयास

पिछले कुछ महीनों में निशांत की सार्वजनिक मौजूदगी बढ़ी है। वे हाल के कार्यक्रमों में पार्टी नेताओं और युवा विधायकों के साथ नजर आए। मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर पटना के महावीर मंदिर में पूजा और पारिवारिक उपस्थिति की तस्वीरों ने भी चर्चाओं को हवा दी है।

तेजस्वी पर भी सस्पेंस

उधर, विपक्षी खेमे में भी हलचल कम नहीं है। तेजस्वी यादव  के राज्यसभा चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हैं। हालांकि उन्होंने अभी तक औपचारिक ऐलान नहीं किया है, लेकिन विधायक दल की बैठक बुलाने से सियासी संकेत जरूर मिले हैं।

जीत का गणित क्या कहता है?

राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए 41 विधायकों का समर्थन जरूरी है। राजद के पास 25 विधायक हैं। कांग्रेस (6), वाम दल (3) और अन्य सहयोगियों को जोड़कर यह संख्या 35 तक पहुंचती है। ऐसे में All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen (AIMIM) के 5 और बसपा के 1 विधायक की भूमिका अहम हो सकती है। AIMIM ने अब तक अपना रुख साफ नहीं किया है, जिससे सस्पेंस और गहराया है।

फिलहाल बिहार की राजनीति में राज्यसभा चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि भावी नेतृत्व और रणनीतिक संकेतों की भी परीक्षा बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में तस्वीर साफ होगी कि यह चर्चा हकीकत में बदलेगी या महज सियासी कयास बनकर रह जाएगी।