क़ानून बनाम कुर्सी: नगर निकाय चुनाव को लेकर बिहार सरकार उलझन में, विजय सिन्हा के सामने बड़ी चुनौती
Bihar news: बिहार की राजनीति में एक बार फिर क़ानून और सत्ता आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। उप मुख्यमंत्री सह नगर विकास एवं आवास मंत्री विजय सिन्हा के लिए बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 अब एक बड़ी सियासी चुनौती बन गया है। अफसरशाही की सलाह, जनप्रतिनिधियों का दबाव और कानूनी बाध्यताओं के बीच सरकार ऐसी स्थिति में फंस गई है, जहां हर फैसला विवाद को जन्म देता दिख रहा है।
दरअसल, बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 की धारा 13 (5) के अनुसार, नगर निकाय का परिसीमन पूरा होने के बाद छह महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है। अगर किसी कारण से चुनाव नहीं हो पाते हैं, तो वहां प्रशासक की नियुक्ति का प्रावधान है। साफ शब्दों में कहें तो कानून जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल की एक स्पष्ट सीमा तय करता है।
लेकिन जमीनी सियासत में तस्वीर कुछ और है। नगर निकायों के मौजूदा जनप्रतिनिधियों को अपना कार्यकाल खत्म होता दिख रहा है, जिससे उन्होंने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। इसी दबाव के बीच विजय सिन्हा ने यह आश्वासन दे दिया कि नगर निकाय चुनाव नहीं होंगे और चुने हुए प्रतिनिधि अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। यह बयान राजनीतिक रूप से राहत देने वाला जरूर है, लेकिन कानूनी नजरिए से सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकता है।
मामले की जड़ दानापुर नगर परिषद से भी जुड़ी है। नगर विकास एवं आवास विभाग ने दानापुर समेत पांच नगर निकायों में परिसीमन को लेकर शासनादेश जारी किया था। इसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। जैसे ही चुनाव की संभावनाएं सामने आईं, दानापुर नगर परिषद के वार्ड पार्षद सक्रिय हो गए। कृषि मंत्री रामकृपाल यादव के नेतृत्व में पार्षदों ने विजय सिन्हा से मुलाकात कर चुनाव टालने की मांग रखी।
अब सरकार के सामने असली सवाल खड़ा हो गया है। या तो वह बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 में संशोधन कर जनप्रतिनिधियों को राहत दे, या फिर कानून के मुताबिक चुनाव या प्रशासक की नियुक्ति का रास्ता अपनाए। दोनों ही विकल्पों में सरकार की राजनीतिक साख और भरोसा दांव पर है।
यह साफ है कि नगर निकाय चुनाव को लेकर क़ानून और सियासत की यह टकराहट आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। अब देखना यह होगा कि बिहार में क़ानून भारी पड़ता है या सियासी दबाव।







