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मृत्युंजय तिवारी का इस्तीफा बना सियासी चर्चा का केंद्र, क्या राजद में टूट की शुरुआत या सिर्फ नाराजगी?

Bihar Politics: यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह राजद में बड़ी टूट की शुरुआत है या केवल एक नेता की नाराजगी का मामला। लेकिन इतना तय है कि मृत्युंजय तिवारी के इस्तीफे ने तेजस्वी यादव के नेतृत्व, उनके करीबी सहयोगियों की भूमिका और पार्टी के अंदरूनी समीकरणों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व इस असंतोष को कैसे संभालता है, इस पर बिहार की राजनीति की नजर रहेगी.
 
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Bihar Politics: राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी के इस्तीफे ने बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है. तिवारी ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देते हुए साफ कहा कि "जहां सम्मान नहीं, वहां रहने का कोई मतलब नहीं।" उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस्तीफा वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता.

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इस्तीफे के बाद तिवारी ने बिना किसी का नाम लिए तेजस्वी यादव के आसपास मौजूद कथित "कोटरी" पर सवाल उठाए. उनका आरोप है कि पार्टी में कुछ लोगों का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि लंबे समय से जुड़े और वफादार नेताओं की बात नहीं सुनी जा रही. उनके बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या राजद के भीतर संगठनात्मक असंतोष गहराता जा रहा है. राजनीति के जानकारों की नजर में मृत्युंजय तिवारी का यह फैसला महज एक पद का त्याग नहीं है, बल्कि यह तेजस्वी यादव के इर्द-गिर्द सक्रिय ‘सलाहकारों के गुट’ के खिलाफ एक खुला विद्रोह माना जा रहा है. दिलचस्प बात यह है कि मृत्युंजय तिवारी की यह पीड़ा हुबहू लालू परिवार के अपने घर के सदस्यों, तेज प्रताप यादव और रोहिणी आचार्य के पुराने आरोपों से मेल खाती है. हालांकि, आरजेडी के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी इस डैमेज कंट्रोल की कवायद में जुट गए हैं, लेकिन इसके साथ ही मृत्युंजय तिवारी के इस्तीफे ने राजद के भीतर एक बड़ी टूट की आशंकाओं को भी हवा दे दी है.

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बता दें कि मृत्युंजय तिवारी करीब एक दशक से राजद का प्रमुख चेहरा रहे हैं. विपक्ष में रहते हुए उन्होंने पार्टी का पक्ष मजबूती से रखा और मीडिया में संगठन की आवाज बने रहे. ऐसे नेता का सार्वजनिक रूप से यह कहना कि सम्मान नहीं मिला और फिर उनका इस्तीफा दे देना, स्वाभाविक रूप से राजद के लिए बड़ा राजनीतिक झटका है. मृत्युंजय तिवारी ने यह भी कहा कि इस्तीफा वापस लेने का सवाल नहीं है और यह फैसला लंबे समय की पीड़ा के बाद लिया गया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक नेता के इस्तीफे तक सीमित नहीं दिखता. हाल के महीनों में पार्टी के भीतर नेतृत्व, निर्णय प्रक्रिया और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका को लेकर उठे सवालों के बीच इस घटनाक्रम ने राजद की अंदरूनी एकजुटता पर नई बहस छेड़ दी है. हालांकि पार्टी की ओर से इसे व्यापक संकट मानने से इनकार किया जा रहा है.

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू मृत्युंजय तिवारी का वह बयान है जिसमें उन्होंने लालू प्रसाद और राबड़ी देवी को पार्टी के भीतर बेबस बताया. दरअसल, आरजेडी में हमेशा से यह परंपरा रही है कि कोई भी बड़ा विवाद लालू यादव के हस्तक्षेप से सुलझ जाता था. इसी राजनीतिक रवायत को देखते हुए वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने तिवारी को लालू यादव से मिलकर बात रखने की सलाह भी दी, लेकिन तिवारी का यह कहना कि ‘वे खुद अब कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं’, यह साफ करता है कि सत्ता का केंद्र पूरी तरह बदल चुका है. इससे भी आगे यह कि यह फैसला तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति में लिया गया है जो जाहिर करता है कि पार्टी के भीतर संकट कितना गहरा चुका है.

इसी बीच भाजपा ने भी इस घटनाक्रम को मुद्दा बनाया है। भाजपा नेताओं ने मृत्युंजय तिवारी को पार्टी में आने का खुला न्योता दिया है, हालांकि तिवारी ने अभी किसी नई राजनीतिक पारी का ऐलान नहीं किया है. खबरों के मुताबिक वे पहले लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी से मुलाकात के बाद आगे का फैसला कर सकते हैं.

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह राजद में बड़ी टूट की शुरुआत है या केवल एक नेता की नाराजगी का मामला। लेकिन इतना तय है कि मृत्युंजय तिवारी के इस्तीफे ने तेजस्वी यादव के नेतृत्व, उनके करीबी सहयोगियों की भूमिका और पार्टी के अंदरूनी समीकरणों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व इस असंतोष को कैसे संभालता है, इस पर बिहार की राजनीति की नजर रहेगी.