परिवारवाद पर तंज से सियासी विरासत तक: नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री से बिहार में नई बहस
निशांत कुमार के जदयू में शामिल होने के बाद सियासी गलियारों में चर्चा तेज हो गई है कि अब बिहार की राजनीति धीरे-धीरे नई पीढ़ी के नेताओं के हाथों में जाती दिखाई दे रही है। इससे पहले तेजश्वी यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल और चिराग पासवान की अगुआई में लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) पहले से ही नई पीढ़ी की राजनीति का चेहरा बन चुके हैं।
परिवारवाद की बहस फिर तेज
दिलचस्प बात यह है कि खुद नीतीश कुमार लंबे समय से परिवारवाद की राजनीति पर सवाल उठाते रहे हैं और अक्सर लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के परिवार को लेकर तंज कसते रहे हैं। ऐसे में उनके बेटे के राजनीति में आने के बाद विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सवाल भी उठा रहा है।
सादगी और आध्यात्मिक रुझान के लिए जाने जाते हैं निशांत
निशांत कुमार अब तक सार्वजनिक जीवन से काफी दूर रहे हैं। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और लंबे समय तक सादगीपूर्ण जीवन व आध्यात्मिक झुकाव के लिए जाने जाते रहे हैं। उन्होंने विवाह भी नहीं किया है और अब तक सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी थी।
बिहार की राजनीति में पहले भी रही विरासत की परंपरा
बिहार की राजनीति में राजनीतिक विरासत का सिलसिला नया नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बेटे राम नाथ ठाकुर, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बेटे संतोष कुमार, और पूर्व एन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के बेटे नीतीश मिश्रा जैसे कई नेता पहले से ही अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते रहे हैं।
अब सवाल यह है कि क्या निशांत कुमार भी अपने पिता की तरह बिहार की राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल कर पाएंगे या फिर उन्हें अपनी अलग पहचान बनाने के लिए लंबा राजनीतिक सफर तय करना होगा। फिलहाल इतना तय है कि उनकी एंट्री के साथ ही राज्य की राजनीति में नई बहस और नई हलचल शुरू हो गई है।







