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बीजेपी में बदला सियासी मिज़ाज: रिश्तों से ऊपर अब ‘रुतबा’, प्रोटोकॉल पर सख़्ती का साफ़ संदेश

 
बीजेपी में बदला सियासी मिज़ाज: रिश्तों से ऊपर अब ‘रुतबा’, प्रोटोकॉल पर सख़्ती का साफ़ संदेश

Political News: भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक गलियारों में इन दिनों सियासत का लहजा बदला-बदला नजर आ रहा है। हालिया सांगठनिक फेरबदल के बाद पार्टी ने साफ कर दिया है कि अब संगठन रिश्तों या व्यक्तिगत समीकरणों से नहीं, बल्कि ओहदे की गरिमा और प्रोटोकॉल से चलेगा। यह संदेश सिर्फ़ दिल्ली के दफ्तरों तक सीमित नहीं है, बल्कि लखनऊ से लेकर ज़मीनी कार्यकर्ताओं तक इसकी गूंज सुनाई दे रही है।

राष्ट्रीय स्तर पर नवनियुक्त कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन के मनोनयन के साथ ही भाजपा ने अनुशासन को लेकर सख़्त रुख अपना लिया है। उम्र और अनुभव में कई वरिष्ठ नेताओं से छोटे होने के बावजूद यह स्पष्ट कर दिया गया है कि अब संबोधन में नाम नहीं, बल्कि पद की मर्यादा के अनुरूप शब्दों का इस्तेमाल होगा। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि संगठन में अनुशासन तभी टिकेगा, जब भाषा और व्यवहार भी उसी कसौटी पर खरे उतरें।

सियासी रणनीति का हिस्सा है सख़्ती

सूत्रों के मुताबिक, यह सख़्ती महज़ औपचारिक आदेश नहीं, बल्कि आने वाले सियासी दौर की रणनीति का संकेत है। नितिन नबीन के जल्द ही पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की अटकलों के बीच पार्टी किसी भी स्तर पर ढील नहीं देना चाहती। साफ संदेश है जो राजनीति अब तक अनौपचारिक रिश्तों के सहारे चल रही थी, वह अब नियम, दस्तावेज़ और अनुशासन के दायरे में चलेगी।

सादगी और अनुशासन का संतुलन

दिलचस्प बात यह है कि तमाम निर्देशों और सख़्ती के बीच नितिन नबीन की सादगी भी चर्चा में है। वे आज भी अपने वरिष्ठ नेताओं से उसी सम्मान और शालीनता के साथ मुलाकात करते हैं, जो भाजपा की संगठनात्मक संस्कृति की पहचान रही है। शायद यही संदेश पार्टी देना चाहती है कि अनुशासन और विनम्रता विरोधी नहीं, बल्कि संगठन की मज़बूती की दो मजबूत नींव हैं।

आपको बता दें कि, भाजपा की यह नई कार्यशैली आने वाले दिनों की राजनीति का संकेत देती है, जहां निजी रिश्तों से ज्यादा महत्व व्यवस्था, मर्यादा और नेतृत्व के ढांचे को मिलेगा।