97 वर्ष के हुए दिलीप कुमार, अमिताभ, शाहरुख और आमिर इन्हें मानते हैं अभिनय की यूनिवर्सिटी..

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बॉलीवुड में ट्रेजडी किंग के नाम से मशहूर दिलीप कुमार यानी मुहम्मद यूसुफ खान आज 97 वर्ष के हो गए है. दिलीप कुमार को सदी के सबसे बड़े एक्टर के रूप में जाना जाता है. बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन, बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान, समेत कई सारे ऐसे सेलेब्स हैं जो दिलीप साहब को किसी यूनिवर्सिटी से कम नहीं समझते. उन्होंने पांच दशकों तक अपने शानदार अभिनय से दर्शकों के दिल पर राज किया है.

दिलीप कुमार को भारतीय फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. इसके अलावा उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से भी सम्मानित किया गया है. अभिनय के क्षेत्र में पाकिस्तान से इतना बड़ा सम्मान किसी को नहीं दिया गया.

दिलीप कुमार का असली नाम मुहम्मद यूसुफ खान है. उनका जन्म पेशावर में 11 दिसंबर, 1922 को हुआ था. उनके पिता फल बेचा करते थे और मकान का कुछ हिस्सा किराए पर देकर गुजर-बसर करते थे. दिलीप ने नासिक के पास एक स्कूल में पढ़ाई की. वर्ष 1930 में उनका परिवार मुंबई आकर बस गया. 1940 में दिलीप कुमार की पिता से किसी बात को लेकर मनमुटाव हो गया. मतभेद के कारण वह पुणे आ गए. यहां उनकी मुलाकात एक कैंटीन के मालिक ताज मोहम्मद से हुई, जिनकी मदद से उन्होंने आर्मी क्लब में सैंडविच स्टॉल लगाया. इसके बाद वह मुंबई वापस लौट आए और इसके बाद उन्होंने पिता को मदद पहुंचने के लिए काम तलाशना शुरू किया.

दिलीप की पहली मूवी थी फिल्म ज्वार भाटा थी. जो 1944 में आई. 1949 में फिल्म अंदाज की सफलता ने उन्हें लोकप्रिय बनाया. दीदार (1951) और देवदास (1955) जैसी फिल्मों में दुखद भूमिकाओं के मशहूर होने की वजह से उन्हें ट्रेजडी किंग कहा गया दिलीप कुमार ने छह दशकों तक चले अपने फिल्मी करियर में मात्र 63 फिल्में की हैं लेकिन उन्होंने हिंदी सिनेमा में अभिनय की कला को नई परिभाषा दी है.

दिलीप कुमार, राजकपूर और देवानंद को भारतीय फिल्म जगत की त्रिमूर्ति कहा जाता है, लेकिन जितने बहुमुखी आयाम दिलीप कुमार के अभिनय में थे, उतने शायद इन दोनों के अभिनय में नहीं.

कहा जाता है कि खालसा कॉलेज में उनके साथ पढ़ने वाले राज कपूर जब पारसी लड़कियों के साथ फ्लर्ट करते थे, तो तांगे के एक कोने में बैठे शर्मीले दिलीप कुमार उन्हें बस निहारा भर करते थे.

किसे पता था कि एक दिन यह शखस भारत के फिल्म प्रेमियों को मौन की भाषा सिखाएगा.

और उसकी एक निगाह भर, वह सब कुछ कह जाएगी, जिसको कई पन्नों पर लिखे डॉयलॉग भी कहने में सक्षम नहीं होंगे