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पटना में दो दिवसीय 'विरासत कार्यशाला' का हुआ आयोजन, युवाओं को विरासत और संस्कृति से जुड़ी बातें बताई गई
 

बिहार पुराविद परिषद्, फेसेस और पटना संग्रहालय के संयुक्त प्रयास से दो दिवसीय 'विरासत कार्यशाला' 2021 का उद्घाटन दो अक्टूबर को किया गया। आज इस कार्यक्रम का दूसरा दिन है। 2 से 3 अक्टूबर 2021 तक चलने वाले इस कार्यशाला में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के लगभग 40 विद्यार्थी, एवं शोधार्थियों ने भाग लिया।  इस कार्यक्रम में डॉ. विमल तिवारी, डॉ. कामेश्वर प्रसाद, सुनिता भारती, डॉ. चित्तरंजन प्रसाद सिन्हा, डॉ. उमेशचंद द्विवेदी, डॉ. डी. एन. सिन्हा आदि मौजूद थे।  

आज कार्यक्रम का प्रारंभ पुरावशेषों के, विशेषकर पेंटिंग के, संरक्षण का व्यवहारिक प्रशिक्षण के साथ हुआ। राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संरक्षण अनुसंधानशाला, लखनऊ के तकनीशियन और विशेषज्ञों ने सौरभ कम्म्कार के नेतृत्व में प्रतिभागियों को, संग्रहालय के प्रयोगशाला में सरक्षण के वैज्ञानिक प्रविधियों का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में पटना संग्रहालय के अवर निदेशक डॉ. विमल तिवारी ने स्लाइड शो के माध्यम से प्रतिभागियों को वास्तु-संरक्षण, भवनों के पुनरुद्धार और अनुरक्षण के विभिन्न विधियों के बारे में विस्तार से बताया।

विरासत कार्यशाला

प्रसिद्द विरासत-कार्यकर्तृ, रंगकर्मी एवं फेसेस की सचिव सुनिता भारती ने सांस्कृतिक विरासतों के प्रचार-प्रसार के सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक तरीकों का परिचय दिया एवं प्रतिभागियों को विरासत नाटक, अस्थि-कलश के पूर्वाभ्यास से रू-ब-रू कराते हुए, रंगमंच के माध्यम से विरासतों की जानकारी को आम जनता के साथ साझा करने की अपनी नई तकनीक का परिचय दिया। वहीं बिहार संग्रहालय के पूर्व निदेशक डॉ. उमेशचंद द्विवेदी ने पुस्तकों और पांडुलिपियों के संरक्षण से संबंधित जानकारी दी। प्रतिभागियों ने पटना संग्रहालय के प्रयोगशाला एवं पुस्तकालय का भी का दौरा भी किया जहां उन्हें पांडुलिपियों के संरक्षण कार्य की विधियों से परिचित कराया गया।

विरासत कार्यशाला

वहीं कार्यक्रम के पहले दिन डॉ. कामेश्वर प्रसाद ने विरासत को परिभाषित किया। वहीं मुख्य अतिथि एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. डी. एन. सिन्हा ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा था कि बिना युवा वर्ग के किसी भी संस्कृति के विरासतों का संरक्षण संभव नहीं है। किसी भी काल खंड में युवा और छात्र ही सांस्कृतिक परंपरा और विरासतों के संवाहक होते हैं, जिसके बदौलत पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी संकृति और विरासत के ज्ञान और उनके संरक्षण-संवर्धन की परंपरा आगे बढ़ती है। पटना संग्रहालय के अपर निदेशक डॉ. विमल तिवारी, ने अपने संबोधन में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा था कि इस प्रकार के आयोजन में युवाओं को अवश्य भाग लेना चाहिए।

कार्यक्रम का उद्घाटन पटना विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. कामेश्वर प्रसाद ने किया। वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार पुराविद परिषद् के कार्यकारी अध्यक्ष एवं काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. चित्तरंजन प्रसाद सिन्हा ने किया। इस कार्यक्रम में डॉ. विमल तिवारी, डॉ. कामेश्वर प्रसाद, डॉ. चित्तरंजन प्रसाद सिन्हा, डॉ. डी. एन. सिन्हा आदि मौजूद थे।