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भारत में एक-तिहाई से ज्यादा महिलाएं घरेलू हिंसा से पीड़ित, नई रिपोर्ट में डराने वाले खुलासे
 

कुछ दिन पहले की बात है दहेज प्रताड़ना के एक मामले में पति की अग्रिम ज़मानत की याचिका को ख़ारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ससुराल में पत्नी को पहुँचाई गई चोटों के लिए प्राथमिक तौर पर पति ज़िम्मेदार होता है, भले ही चोटें रिश्तेदारों की वजह से आई हों. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट में जिस मामले की सुनवाई चल रही थी उसमें पत्नी ने अपने पति, सास और ससुर के ख़िलाफ़ दहेज की माँग पूरी ना करने के कारण बुरी तरह पीटने का आरोप लगाया है, ये शिकायत पंजाब के लुधियाना में जून 2020 में दर्ज की गई थी.

महिला का आरोप है कि उसे पति और ससुर ने क्रिकेट बैट से बुरी तरह पीटा और उसके मुंह पर तकिया रखकर उसका दम घोटने की कोशिश की. इसके बाद उन्हें सड़क पर फेंक दिया गया और उनके पिता और भाई उन्हें लेकर गए. महिला की मेडिकल रिपोर्ट में भी शरीर पर कई जगह चोटें आने की पुष्टि हुई है. जिसमें एक बड़े और ठोस हथियार से मारने की बात भी सामने आई है.पति ने ये कहते हुए अग्रिम ज़मानत की याचिका दायर की थी कि पत्नी की बैट से पिटाई उसने नहीं बल्कि उसके पिता ने की थी.लेकिन, मुख्य न्यायाधीश एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि ये मायने नहीं रखता कि आपने या आपके पिता ने कथित तौर पर बैट का इस्तेमाल किया था. अगर किसी महिला को ससुराल में चोट पहुँचाई जाती है तो उसकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी पति की होती है. ये कहते हुए कोर्ट ने पति की याचिका ख़ारिज कर दी. 

ये किसी एक महिला की कहानी नहीं हैं एक तरफ जहां महिलायें पुरुषों के कंधे से कंधे मिलाकर काम करती हैं वही घरेलु हिंसा भी हमारे समाज में आम बात है. हमारे देश में एक-तिहाई से ज्यादा महिलाएं घरेलू हिंसा से पीड़ित हैं ये डराने वाले खुलासे NFHS की नई रिपोर्ट में की गयी है.

5 मई को गुजरात के वडोदरा में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने NFHS-5 का नया डेटा जारी किया. नई रिपोर्ट में सामने आया है कि देश में लगभग एक तिहाई महिलाओं ने शारीरिक या यौन हिंसा का सामना किया है. सर्वे में फिज़िकल, मेंटल और सेक्शुअल वायलेंस को लेकर चिंता में डालने वाले खुलासे हुए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक़, 18 से 49 साल की करीब 30 फीसदी महिलाओं ने 15 साल की उम्र से शारीरिक हिंसा का सामना किया है. वहीं, सर्वे की 6% महिलाएं अपने जीवन में सेक्शुअल वायलेंस का शिकार हुई हैं.हालांकि, रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा में कमी आई है. मामलों की संख्या 31.2% से घटकर 29.3% हो गई है.

हलाकि कई मामलों में विक्टिम की तरफ़ से दर्ज ही नहीं किए जाते. रिपोर्ट में इससे संबंधित भी एक डेटा है, जो बताता है कि शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं में से केवल 14 फीसदी महिलाएं अपने एक्सपीरियंस को सामने लाती हैं, आगे लेकर जाती हैं.

वहीँ बात वैवाहिक हिंसा. मतलब पार्टनर द्वारा की गई हिंसा. की करें तो सर्वे में पाया गया है कि 18 से 49 साल के एज-ग्रुप की 32% विवाहित महिलाएं फिज़िकल, सेक्शुअल या इमोशनल हिंसा से पीड़ित हैं. वैवाहिक हिंसा में सबसे ज़्यादा मामले शारीरिक हिंसा के हैं. सबसे ज़्यादा मामले कर्नाटक से हैं, 48 फीसदी. इसके बाद बिहार, तेलंगाना, मणिपुर और तमिलनाडु. लक्षद्वीप में घरेलू हिंसा के सबसे कम मामले रिपोर्ट किए गए हैं, यानि 2.1 फीसदी.

महिलाओं को लेकर इतनी सारी बातें सुनने के बाद आप इसे ‘पुरुषों के लिए ऐसा कोई सर्वे नहीं होता ’ ये कह कर ख़ारिज करें, इसके पहले आपको बता देते हैं कि रिपोर्ट में पुरुषों से जुड़ी संख्या भी है. NFHS-5 के नए डेटा के मुताबिक़, देश में 4 फीसदी पुरुष भी घरेलू हिंसा का सामना करते हैं.

देखिए अगर ये कह दिया जाए कि पितृसत्ता कारण है, तो बड़ा वेग हो जाएगा. हमारे समाज में जिस तरह से पितृसत्ता काबिज़ है, उसे पहचानना होगा. एक-एक फैक्टर समझना होगा. नहीं तो हम किसी लॉजिकल समाधान तक नहीं पहुंच पाएंगे. जैसे इस रिपोर्ट में बताया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक़, महिलाओं के ख़िलाफ़ शारीरिक हिंसा के 80% से ज़्यादा मामलों में अपराधी पति होता है. लेकिन हमें समझना होगा कि वो कौन से फैक्टर्स हैं, जो ऐसे मामलों को प्रभावित करते हैं. 

अब बात कानून की करें तो महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा से जुड़े कई कानून हैं जिनमें से एक क़ानून है, ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005’. इसमें शारीरिक, आर्थिक, भावनात्मक और मानसिक हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून बनाया गया. इसके तहत केवल महिला ही शिकायत कर सकती है. घरेलू हिंसा क़ानून में कहा गया है कि तीन दिनों के अंदर मामले की सुनवाई होगी और 60 दिनों के अंदर अंतिम आदेश आएगा. लेकिन, असल में तो पहली सुनवाई के लिए ही महीनों लग जाते हैं. अंतिम आदेश आने में सालों निकल जाते हैं.” क़ानून के स्तर पर ज़िम्मेदारियां तय होने के बाद भी महिलाएं संघर्ष कर रही हैं. उन्हें मेडिकल टेस्ट की जानकारी नहीं होती. वो समय रहते टेस्ट नहीं करातीं तो हिंसा के सबूत ही नहीं मिल पाते. मुकदमे लंबे चलते हैं इसलिए वो थककर पीछे ही हट जाती हैं. इसलिए क़ानून को तो पुख़्ता बनाया ही जाना चाहिए लेकिन उसके अनुपालन पर भी ध्यान देना चाहिए.